ग्रामीण विकास में पंचायती राज की भूमिका
केदार कुमार1, डाॅ. अष्विनी महाजन2
1(षोधार्थी), शास. विष्वनाथ यादव तामस्कर स्ना. स्व. महाविद्यालय, दुर्ग (छ.ग.)
2(प्राध्यापक), शोध निर्देशक, शास. विष्वनाथ यादव तामस्कर स्ना. स्व. महाविद्यालय, दुर्ग (छ.ग.)
*Corresponding Author E-mail: sahuk7641@gmail.com
ABSTRACT:
भारत गाँवों का देष है तथा भारत की आत्मा गाँवों में निवास करती है। छत्तीसगढ़ में पंचायती राज व्यवस्था को तीन स्तरों में विभक्त किया गया है-ग्राम पंचायत, जनपद पंचायत एवं जिला पंचायत। ग्राम पंचायत, जनपद पंचायत एवं जिला पंचायत का विकास कार्य के लिए वित्तीय सहायता राज्य सरकार के माध्यम से किया जाता है। ग्राम पंचायतों में सरपंच, सचिव एवं पंचों की भूमिका मुख्य होता है। वहीं जनपद स्तर में जनपद सदस्य, जनपद अध्यक्ष एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी (जो कि भारतीय प्रषासनिक सेवा) स्तर के होते हैं।
KEYWORDS: सर्वांगीण, जाल, विभक्त, हाट-बाजार, यादृच्छिक, वित्तीय राषि।
प्रस्तावना -
भारत गाँवों का देष है तथा भारत की आत्मा गाँवों में निवास करती है। यह उक्त कथन हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी ने कही है। यदि देष का सर्वांगीण विकास करना है तो गाँवों की स्थिति में परिवर्तन करना अनिवार्य है, तभी सम्पूर्ण ग्राम एवं साथ ही साथ राष्ट्र का उत्थान किया जा सकता है। ग्रामों की वास्तविक कायाकल्प 73वें संविधान संसोधन 1993 से प्रारम्भ हुआ जब गाँवों की स्थितियों में बहुत कुछ सुधार हुआ है। आज प्रत्येक ग्राम में प्राथ्मिक एवं माध्यमिक विद्यालय अवष्य है। गाँव से खेत की ओर जाने के लिए सड़क मार्ग से जोड़ दिया जाता है।
वर्तमान में एक भी गाँव ऐसा नही है जो प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना तथा छत्तीसगढ़ जैसे आदिवासी राज्य में मुख्यमंत्री सड़क योजना के माध्यम से सम्पूर्ण राज्य में सड़कों का जाल बिछा हुआ है जिसकी सहायता से यातायात में बहुत सुधार एवं सुगमता आ गया है।
छत्तीसगढ़ में पंचायती राज व्यवस्था को तीन स्तरों में विभक्त किया गया है-ग्राम पंचायत, जनपद पंचायत एवं जिला पंचायत। जिसमें परिसीमन 2015-16 के अनुसार 11,664 ग्राम पंचायत, 146 जनपद पंचायत एवं जिला पंचायतों की संख्या 27 है। ग्राम पंचायत, जनपद पंचायत एवं जिला पंचायत का विकास कार्य के लिए वित्तीय सहायता राज्य सरकार के माध्यम से किया जाता है। ग्राम पंचायतों में सरपंच, सचिव एवं पंचों की भूमिका मुख्य होता है। वहीं जनपद स्तर में जनपद सदस्य, जनपद अध्यक्ष एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी (जो कि भारतीय प्रषासनिक सेवा) स्तर के होते हैं। इन तीनों स्तर में शासन - प्रषासन तथा जनता प्रतिनिधि की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रहती है, जिसके माध्यम से पंचायत राज की भूमिका को साकार किया जाता है, किन्तु वर्तमान में पंचायत स्तर के कार्यों में अनियमितता तथा कार्यों में देरी से विकास कार्य बहुत विलम्ब हो रही है।
उद्देष्य:-
उद्देष्य निर्माण से ही अध्ययन त्रुटि रहित एवं निष्पक्ष होते है, प्रस्तुत अध्ययन हेतु निर्धारित उद्देष्य निम्नानुसार है -
1- उत्तरदातओं के सामान्य एवं पारिवारिक अध्ययन ज्ञात करना।
2- सचिव, सरपंच, उपसरपंच एवं पंचों की सामाजिक-आर्थिक एवं राजनैतिक समस्या ज्ञात करना।
3- सचिव, सरपंच व पंचों को ग्राम पंचायत तथा सरकार से प्राप्त होने वाले सुविधाओं को ज्ञात करना।
4- पंचायतों एवं प्रषासन के मध्य भूमिकाओं को ज्ञात करना।
शोध विषय की प्रासंगिकता -
पूर्व में पंचायत स्तर के विकास सम्बन्धी समस्याओं एवं शासन-प्रषासन द्वारा ग्राम विकास के विभिन्न स्तरों के अधोसंरचना पर अध्ययन हुए है, उसमें अधिकांष शोधकर्ताओं द्वारा ग्राम पंचायतीय क्षेत्रों में अध्ययन व वित्त की कमी से होने वाले समस्याओं पर शोध कार्य किया है। इस स्थिति को वैज्ञानिक युग को दृष्टिगत रखते हुए यह शोध अत्यन्त महत्वपूर्ण हो सकता है। अतः ग्राम पंचायतों में प्रषासनिक व राजनीतिक स्थिति एवं समस्याओं का समाजषास्त्रीय शोधपरक अध्ययन आवश्यक व प्रयासपूर्ण भी है। एक कारण यह भी है कि, शोध विषय ‘‘ग्रामीण विकास में पंचायतीय स्तरों की भूमिका’’ है, जिसमें राजनांदगाँव जिले का अध्ययन किया जाता है।
शोध प्रविधि एवं क्षेत्र -
किसी भी प्रकार के शोध कार्य के पूर्व यह आवष्यक है कि शोध कार्य हेतु किस प्रकार शोध पद्धति का चयन किया जाता है। तथ्यों के संकलन करने हेतु संभावित निदर्षन विधि का प्रयोग होता है। जिसके अन्तर्गत् पायलेटिंग सर्वे के द्वारा 25-25 उत्तरदाताओं का चयन किया, जिसमें राजनांदगाँव जिले के तीन तहसील खैरागढ़, छुईखदान व डोंगरगढ़ का चयन किया गया।
प्राथमिक तथ्यों का संकलन साक्षात्कार व संरचित अनुसूची अवलोकन विधि तथा समूह चर्चा तथा द्वितीयक आँकड़ों के संकलन के लिए विषय से सम्बन्धित तथ्यों के संकलन, शोध पत्र, टेलिविजन आदि का प्रयोग किया गया है।
न्यादर्ष -
शोधकार्य में राजनांदगाँव जिले के तीन जनपद पंचायतों एवं ग्राम पंचायतों का चयन किया गया। जिसमें उत्तरदाता के रूप में पंचायत स्तर के जनप्रतिनिधि यादृच्छिक विधि से 25-25 उत्तरदाता का चयन किया गया ळें
सारणी क्रमाँक-01 पंचायतीय कार्यों में व्यवधान
उपर्युक्त सारणी में पंचायतीय जनप्रतिनिधियों द्वारा प्राप्त जानकारी से स्पष्ट हुआ कि, 76 प्रतिषत् उत्तरदाताओं का मानना है कि, पंचायतों के विभिन्न कार्यों में कोई न कोई समस्या होती है तथा 24 प्रतिषत् उत्तरदाताओं ने बताया कि पंचायत के कार्यों में किसी भी प्रकार के व्यवधान से इंकार किया। जिन उत्तरदाताओं ने पंचायत के कार्यों में निम्न व्यवधान या समस्याएँ स्पष्ट किया है-कई मामलों में वित्तीय समस्या, शासकीय योजनाओं को जनता तक पहुंचाने के लिए आम जनता की राय, विरोध एवं समर्थन न मिलना, स्वास्थ्यगत् समस्याएँ आदि।
विष्लेषण से स्पष्ट है कि, किसी भी पंचायतीय स्तर के कार्यों में अधिकांषतः किसी न किसी प्रकार की समस्याओं का सामना होता है।
सारणी क्रमाँक-02 पंचायत में वित्तीय समस्या
उपर्युक्त सारणी के विष्लेषण से स्पष्ट है कि, 76 प्रतिषत् उत्तरदाताओं ने स्पष्ट किया कि ग्राम पंचायत में हमेषा वित्तीय संकट रहता है और 24 प्रतिषत् उत्तरदाताओं ने स्पष्ट किया कि, ग्राम पंचायत को वित्तीय सहायता निर्धारित समय पर प्राप्त हो जाता है। 76 प्रतिषत् उत्तरदाताओं ने बताया कि, ग्राम पंचायतों में वित्तीय सहायता सर्वोपरि है। वित्त के अभाव में विकास कार्यों में बाधा होती है। विभिन्न चरणों से गुजरने के कारण कभी भी निर्धारित वित्तीय सहायता का भुगतान तय समय सीमा में नहीं हो पाता है। जिससे की वित्तीय संकट हमेषा बना रहता है।
निष्कर्ष -
पंचायतीय स्तरों के विकास कार्य ग्रामीण अंचलों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है तथा पंचायतों के माध्यम से इन विकास कार्यों को किया जाता है। जिससे ग्रामीण क्षेत्र एवं ग्राम विकास में विकास कार्य के माध्यम से सड़क, पेयजल, सार्वजनिक शौचालय, जल निकासी, तालाब एवं हाट-बाजार विकास आदि कार्यों में गति आती है। किसी भी ग्राम विकास की रूपरेखा पंचायतों में तैयार होती है, जिसमें सभी पंचायतीय स्तर के जनप्रतिनिधि एवं ग्रामीणों की उपस्थिति होती है। इसमें वित्तीय राषि राज्य सरकार के माध्यम से दिया जाता है, किन्तु यही राषि तय समय में न मिले तो विकास कार्य अवरूद्ध हो जाता है। ऐसे में शासन-प्रषासन को वित्तीय सहायता राषि को शीघ्रता से उपलब्ध कराया जाना चाहिए, जिससे ग्रामीण विकास की परिकल्पना को सिद्ध किया जा सके।
सन्दर्भ ग्रंथ सूची -
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6. तोमर, संजय, ग्रामीण विकास में ग्राम पंचायत, डाॅ. बी. आर. अम्बेडकर विष्वविद्यालय, आगरा, 2017.
Received on 12.02.2021 Modified on 04.03.2021 Accepted on 24.03.2021 © A&V Publication all right reserved Int. J. Ad. Social Sciences. 2021; 9(2): 120-122. DOI: |
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